आजकल जरा सी छींक भी आ जाए तो डॉक्टर
इतने सारे टेस्ट लिख देते हैं कि समझ नहीं आता कि इनकी जरूरत है भी या नहीं।हमारे साथ ऐसा बहुत बार होता है ।हम लोग यह सोचते हैं कि डॉक
टर ने कहा है तो करवा लेते हैं।मेरे साथ यह घटना कई बार हो गई तो सोचा इस विषय पर लिखना चाहिए।
आज कल डाक्टर दुकान दारी करते नजर आते हैं। एक बार मेरे पति को तकलीफ हुई जिसकी वजह से डाक्टर के पास जाना पडा।जैसे ही हम कलिनिक पहँचे डाक्टर ने कहा आप बस दाखिल हो जाओ आप का आपरेशन करना होगा।इतने मे इनहोने अपने आफिस
फोन किया।उनहोने दुसरे हासपिटल जाने के लिये कहा।हम वहाँ गए तो बिना आपरेशन के ही इनका इलाज हो गया।यह डाक्टर इतना डरा देते है
कि दुसरी राय भी नहीं लेने देते।
एक घटना तो मेरी जिदँगी मे 2014 मे हुई है ।
मैं ने ऐसे ही डाक्टरोँ के चलते अपनी बेटी को सदा के
लिए खो दिया। एक बुखार औऱ उलटी की वजह
से दाखिल करना पडा।
कोई कहे डेग्ँ है कभी कहें टाऩसिल हैँ ।इन सब के चलते उसको फिट पड गया। एक नामी हासपिटल वालों को फिट का कारण समझ नहीं आया।
दो फिट के बाद ही वैनटीलेटर लगा दिया।उसको लगातार नींद के ईनजैकशन देते रहे।उसको
एक बार भी होश मे नहीं आने दिया।उलटा कोमा के ईनजैकशन लगाने शुरू कर दिये।आज कल मैं ने कितने लोगों को देखा है जिनको फिट पडते हैं।मेरी बेटी की तो ऐसी कोई बिमारी नहीं थी कि उसे शुरू से फिट
पडते हों।मेरी बेटी को एक एक लाख के पाचं टीके लगाए जो बाजार मे 15 से20 हजार के बीच मे था
लेकिन फिर भी उसे होश नहीं आया।अब मेरी बेटी जीवन की लडाई लड. रही थी।कुछ भी ठीक नही था।
मेरे दिल मे डर घर करने लग गया था कि कुछ गलत हो रहा है।अब हम अपनी बेटी को वहाँ से ले जाना चाहते थे।दुसरे हासपिटल मे देखना शुरू किया। टाँसफर
वाला केस था।कोई भी लेने के लिए राजी नहीं था।
काफी धक्के खाने के बाद मेरी बेटी को हमने निमहाँस हासपिटल मे शिफ्ट किया।उनहोने जाते ही बता दिया कि एक ही पृतिशत उम्मीद बाकी है। वैनटीलेटर कि वजह से कोई भी अगँ अपने आप काम नहीं कर रहा था। औऱ निमहास मे दस दिन बाद मेरी बेटी इस दुनिया को अलविदा कह गई।बडे बडे शहरों मे जो डाक्टर बेठै हैं पता नहीं उनके पास डिग्री भी असली है या नहीं।
अभी पिछले हफ्ते मैं अपनी छोटी बेटी को डाक्टर के
पास ले कर गई ।बुखार की वजह जाते ही डाक्टर ने काफी सारे टैसट लिख दिये।जब रिपोर्ट दिखाई तो बोले कि यह यह परेशानी हो सकती है। 2250 रुपये का एक टीका है आप 10 टीके लगवा लो।वही रिपोर्ट मैं ने सरकारी डिसपैसरी मे दिखाई तो उस डाक्टर ने बताया कि इतने पावर वाले टीकौँ की जरुरत नहीं है।तो इससे जाहिर होता है कि आज कल के डाक्टर दुकान दार बन गए हैं जो महँगी से महँगी दवाई बेचना चाहते हैं भले ही किसी की जान चली जाए ।ये डॉक्टर नहीं जल्लाद हैं।
Friday, 26 February 2016
Doctor ya Dukandaar
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