Swacch Bharat ka naara her koi lagaata, Kahan hui hai safaai ye koi nahi batlaata. Nadiyaan naale badal gai hain gandgi ke dher main,. Khaali pencil chala rahe hain tex ke her fer main. Toilets ban rahe hain khoob jor shor se, karmchari doob rahe hain seewar ke ghol main. Sarke saari badal gai hain plastic ke dher main,. Dab gai hain aawaazen mantrion ke shor main. Aapas main neecha dkhaane ki lagi hui hai hor, bhalaai ye kaise ye karenge jab aage barhne ki hai dorh. Janta ne vote diya or bethaaya gaddi pe,janta ki hi arzi ko phaink diya hai raddi main. Kuch kaam kro neta logo kro bhalaai desh ki,. Kha ker janta ka paisa naak kataai desh ki.
My Words
Tuesday, 2 October 2018
Wednesday, 20 July 2016
Desh ki hawa
Desh main beh rahi kaisi byaar (hawa) hai,
Charon taraf macha hua hahakar hai.
Kisi ko maar rahe gharon se kheench kar,
Kinhi ko peet rahe gaariyon se bandh ker.
Neta machate bhaai-chaare ka shor hain,
Dete hain duhaai gau(cow ) mata pe jor hai.
Mata ki aarh main kamjoron pe chot hai,
Kaisi hai byaar or kaisa ye shor hai.
Dekhte hain neta par jubaan khamosh hai,
Karte hain chinta-kashi or bhashno pe jor hai.
Netaon ke paas nahi koi samadhan hai,
Kainchi se bhi tej inaki chalti jubaan hai.
Dharm ki naam per karte hain raajneeti,
Khaali hain aankhein inki khamosh jubaan hai.
Friday, 10 June 2016
Gaai(cow) hamari mata hai
Gaai hamari maata hai isko bachana hamara dharm hai.Aaj kal her doosre teesre din ye naara sunne ko mil jata hai. Is naare ke kya maaine hain ye wo bhi nahi jaante. bas ek mudda mil gya hai jiske naam per wo logon ko tang ker sakte hain. jaane kitne logon ko preshan ker chuke hain. jo log naare lagaate hui logon ke gharon me ghoos jaate hain unko sarak ke kinare bethi hui Gaai nazar nahi aati. delhi main jagah jagah Gaai bethi rehati hai. jo khane ke naam per kachra khati hain. Kachra ke Saath saath wo polythene bhi kha jaati hain. log khane ka samaan polythene me daal ker phenkte hain. Gaai poly-bag ke saath hi roti aata jo bhi hota hai kha leti hain or mar jaati hain.
Kitni hi Gaai ke tummy se kitne kilo ke hisaab se polythene nikla. ye Gaai ke rakhwaale in lawaaris Gaai ko animal shelters mein kyon nahi chor ker aate. ye sirf logon ko preshan karne ki baatein hai. jo log sewa bhav rakhte hain wo dhindhora nahi peetaty.meri to sabse yahi binti hai ki khane ki cheez ko polythene mein na daalen. janwaro ko samjh nahi hoti ki wo khol ker khaynge. say no to polythene.
Monday, 9 May 2016
मंदिरों में वयवस्था की कमी
अभी हाल ही मे हम अपने ग्रुप के साथ माउन्ट आबू गए।वहां घूमने के बाद हम लोग अम्बा जी के दर्शन करने के लिए गए।अम्बा जी का मन्दिर बहुत ही भव्य है।सफ़ेद मार्बल से बना हुआ मन्दिर जो आपको
बहुत ही आकर्षित करता है।जैसे ही हम आगे बड़े दो पुलिस वाले जिनमें एक लेडी पुलिस भी थी जो की बहुत ही गंदे तरीक़े से आपका सामान चैक कर
रही थी।वहां से आगे बड़े तो मंदिर में परवेश करने के रास्ते सफ़ेद मार्वल का फर्श था।फर्श इतना गर्म था कि हम लोगों के पैर जल रहे थे।
कंही कंही टाट था लेकिन जगह जगह से इकठ्ठा हो रखा
था।चलो हम और आगे बड़े, कुछ लोगों ने अगर-बत्ती और नारियल हाथ में लिया हुआ था।आगे बड़े तो एक पुलिस वाला बोला कि नारियल यहाँ साइड में एक जगह बनाई हुई थी वहाँ तोड़ कर फिर ले कर जाओ।
यहाँ नारियल तोड़ रहे थे वहाँ नारियल का पानी नाली में बह रहा था और बहुत ही बदबू आ रही थी।सभी जानते हैं कि नारियल पानी कितना उपयोगी होता है।कितना नारियल पानी बरबाद होता है किसी को कोई परवाह नहीं।और आगे गये तो पानी पीने का कूलर लगा हुआ था।कूलर का पानी खारा और गर्म था।कूलर काम नहीं कर रहा था।हमने गर्म और खारा पानी पी कर ही
प्यास बुझा ली।जैसे तैसे धका मुकी करके हमने माँ अम्बे के दर्शन कर लिये।मन्दिर बहुत ही विशाल और भवय था।सोने का वर्क चढ़ा हुआ खूबसूरत मंदिर।चलो माँ के दर्शन हो गए।अब हम लोग बाथरूम जाना चाहते थे।
किसी से पुछा तो उसने रास्ता बता दिया।वहां जा कर जो दृश्य देखा मेरे तो होश उर गए।एक 8/6 फीट की जगह में पुराने जमाने का ओपन बाथरूम था।ना वहां इंडियन टॉयलेट थी ना इंग्लिश।बस सब ऐसे ही एक दूसरे के सामने ही बेठै हुये थे।इतना बड़ा मन्दिर और इतना चढ़ावा चढ़ता है लेकिन भक्तों के लिये जन सुविधाओं की इतनी कमी।इतना पैसा श्रद्धालु चढ़ाते हैं क्या उनके लिये पीने के पानी और शौचालय की कमी क्यों।ये मदिरों की इतनी कमाई का कोई हिसाब नहीं।कम से कम इतना पैसा आता है लंगर का प्रबन्ध हो ठंडे पानी का प्रबन्ध हो ।जनसुविधाओं का प्रबन्ध हो ताकि विदेशी आए तो हमारी व्यवस्था की तारीफ़ करें।वो ये सब देख कर सोचते होँगे कितना गरीब देश है।
Friday, 26 February 2016
Doctor ya Dukandaar
आजकल जरा सी छींक भी आ जाए तो डॉक्टर
इतने सारे टेस्ट लिख देते हैं कि समझ नहीं आता कि इनकी जरूरत है भी या नहीं।हमारे साथ ऐसा बहुत बार होता है ।हम लोग यह सोचते हैं कि डॉक
टर ने कहा है तो करवा लेते हैं।मेरे साथ यह घटना कई बार हो गई तो सोचा इस विषय पर लिखना चाहिए।
आज कल डाक्टर दुकान दारी करते नजर आते हैं। एक बार मेरे पति को तकलीफ हुई जिसकी वजह से डाक्टर के पास जाना पडा।जैसे ही हम कलिनिक पहँचे डाक्टर ने कहा आप बस दाखिल हो जाओ आप का आपरेशन करना होगा।इतने मे इनहोने अपने आफिस
फोन किया।उनहोने दुसरे हासपिटल जाने के लिये कहा।हम वहाँ गए तो बिना आपरेशन के ही इनका इलाज हो गया।यह डाक्टर इतना डरा देते है
कि दुसरी राय भी नहीं लेने देते।
एक घटना तो मेरी जिदँगी मे 2014 मे हुई है ।
मैं ने ऐसे ही डाक्टरोँ के चलते अपनी बेटी को सदा के
लिए खो दिया। एक बुखार औऱ उलटी की वजह
से दाखिल करना पडा।
कोई कहे डेग्ँ है कभी कहें टाऩसिल हैँ ।इन सब के चलते उसको फिट पड गया। एक नामी हासपिटल वालों को फिट का कारण समझ नहीं आया।
दो फिट के बाद ही वैनटीलेटर लगा दिया।उसको लगातार नींद के ईनजैकशन देते रहे।उसको
एक बार भी होश मे नहीं आने दिया।उलटा कोमा के ईनजैकशन लगाने शुरू कर दिये।आज कल मैं ने कितने लोगों को देखा है जिनको फिट पडते हैं।मेरी बेटी की तो ऐसी कोई बिमारी नहीं थी कि उसे शुरू से फिट
पडते हों।मेरी बेटी को एक एक लाख के पाचं टीके लगाए जो बाजार मे 15 से20 हजार के बीच मे था
लेकिन फिर भी उसे होश नहीं आया।अब मेरी बेटी जीवन की लडाई लड. रही थी।कुछ भी ठीक नही था।
मेरे दिल मे डर घर करने लग गया था कि कुछ गलत हो रहा है।अब हम अपनी बेटी को वहाँ से ले जाना चाहते थे।दुसरे हासपिटल मे देखना शुरू किया। टाँसफर
वाला केस था।कोई भी लेने के लिए राजी नहीं था।
काफी धक्के खाने के बाद मेरी बेटी को हमने निमहाँस हासपिटल मे शिफ्ट किया।उनहोने जाते ही बता दिया कि एक ही पृतिशत उम्मीद बाकी है। वैनटीलेटर कि वजह से कोई भी अगँ अपने आप काम नहीं कर रहा था। औऱ निमहास मे दस दिन बाद मेरी बेटी इस दुनिया को अलविदा कह गई।बडे बडे शहरों मे जो डाक्टर बेठै हैं पता नहीं उनके पास डिग्री भी असली है या नहीं।
अभी पिछले हफ्ते मैं अपनी छोटी बेटी को डाक्टर के
पास ले कर गई ।बुखार की वजह जाते ही डाक्टर ने काफी सारे टैसट लिख दिये।जब रिपोर्ट दिखाई तो बोले कि यह यह परेशानी हो सकती है। 2250 रुपये का एक टीका है आप 10 टीके लगवा लो।वही रिपोर्ट मैं ने सरकारी डिसपैसरी मे दिखाई तो उस डाक्टर ने बताया कि इतने पावर वाले टीकौँ की जरुरत नहीं है।तो इससे जाहिर होता है कि आज कल के डाक्टर दुकान दार बन गए हैं जो महँगी से महँगी दवाई बेचना चाहते हैं भले ही किसी की जान चली जाए ।ये डॉक्टर नहीं जल्लाद हैं।
Saturday, 20 February 2016
हमारे टैक्स का दुरुपयोग
हमारे मेहनत की कमाई का एक हिस्सा जो टैक्स के रूप में हमारी सरकार को जाता है ,उसकी बर्बादी कैसे होती है यह देखने वाली बात है।
आजकल हर चौराहे पर और हर सड़क के किनारे अर्द्ध गोलाकार बना दिये गए हैं ताकि चौरस किनारों से
किसी को नुक्सान ना हो।वैसे तो यह बहुत
अच्छा काम है, लेकिन अगर इस काम को ज़िमेदारी के साथ किया गया होता तो ज्यादा अच्छा होता।ये अर्द्ध गोलाकार कब बने और कब टूट गए पता ही नहीं चला।
सभी चौराहे और सड़कों का यही हाल है।कुछ दिन पहले सब टूटे हुए थे, अब उनको उठा कर वैसे ही प्लास्टर लगा कर जोड़ दिया गया है।मेरा कहना यह है कि जो इंजीनियर इस काम को देखते हैं क्या
उनको पता नहीं कि, रेत और सीमेन्ट का रेशो
क्या होता है जिससे बनाया गया मिक्सचर मज़बूत हो।या फिर इंजीनियर और ठेकेदार की मिलीभगत का
नतीज़ा है ये सड़क के किनारे बने हुये ये अर्द्ध गोलाकार
इतने कमजोर हैं कि एक साइकिल की टक्कर से ही टूट जाएं।क्यों नहीं ऐसे काम करते जो सालों तक चलें।
जितना पैसा का ठेका इनको मिलता है उसका आधा भी लगा दें तो बड़िया काम हो।लेकिन अगर सौ रूपय में से पच्चीस रुपये ही लगाने हैं तो ऐसा ही काम होगा।जरूरत है ऐसे इंजीनियर और ठेकेदारों की नकेल कसने की।लेकिन करेगा कौन? सभी तो मिले हुए होते हैं।चोर चोर मौसेरे भाई।
Thursday, 18 February 2016
एक दिन की सफाई
आजकल शहरों में चलन है सफाई का, और वो भी बहुत जोर शोर से। किसी भी एक नेता को बुला लिया जाता है। इसके लिए पहले से ही प्रचार शुरू हो जाता है। उस क्षेत्र के जाने माने लोग भी आ जाते हैं। नेता जी के साथ मिल कर खूब सफ़ाई होती है और खूब फ़ोटो
निकाले जाते हैं। नेता जी के जाने के बाद सभी चले जाते हैं। उसके बाद सब उस जगह के बारे में भूल जाते हैं। उस जगह पर फिर से गंदगी जमा होने लग जाती है।लोग छोटे छोटे बने हुये शॉपिंग मॉल में आते हैं जो सोसाईटी के पास ही बने होते हैं, ताकि लोग अपनी जरूरत का सामन ख़रीद सकें। इन दुकानों पर हर सामान मिल जाता हैं। साथ में छोटे छोटे दुकान दार
जैसे चाट वाला आइसक्रीम वाले भी बैठ जाते हैं। अब हमारे जैसे ही लोग जो पढ़े लिखे होते हैं
अपने बच्चों को लेकर जाते हैं। वह अपने बच्चों को आइसक्रीम या कुछ और भी लेकर देंगे तो
उस खाने का कवर वंही फैंक देंगे। अब जगह
जगह कुढ़े दान होने के बावज़ूद इधर उधर कुढ़ा
डालेंगे तो गंद तो फैलेगा। अब इसके जिम्मेदार तो हम खुद ही हैं, तो बजाए एक दिन सफ़ाई करने के, अगर हम यह सोच लें की हमको गंद नहीं डालना है तो
हमारा शहर खुद ब खुद ही साफ़ रहेगा। तो हमारा नारा होना चाहिए। गंद नहीं फैलाना है शहर को सुंदर बनाना है।