Wednesday, 20 July 2016

Desh ki hawa

Desh main beh rahi kaisi byaar (hawa) hai,
Charon taraf macha hua hahakar hai.
Kisi ko maar rahe gharon se kheench kar,
Kinhi ko peet rahe gaariyon se bandh ker.
Neta machate bhaai-chaare ka shor hain,
Dete hain duhaai gau(cow ) mata pe jor hai.
Mata ki aarh main kamjoron pe chot hai,
Kaisi hai byaar or kaisa ye shor hai.
Dekhte hain neta par jubaan khamosh hai,
Karte hain chinta-kashi or bhashno pe jor hai.
Netaon ke paas nahi koi samadhan hai,
Kainchi se bhi tej inaki chalti jubaan hai.
Dharm ki naam per karte hain raajneeti,
Khaali hain aankhein inki khamosh jubaan hai.

Friday, 10 June 2016

Gaai(cow) hamari mata hai

Gaai hamari maata hai isko bachana hamara dharm hai.Aaj kal her doosre teesre din ye naara sunne ko mil jata hai. Is naare ke kya maaine hain ye wo bhi nahi jaante. bas ek mudda mil gya hai jiske naam per wo logon ko tang ker sakte hain. jaane kitne logon ko preshan ker chuke hain. jo log naare lagaate hui logon ke gharon me ghoos jaate hain unko sarak ke kinare bethi hui Gaai nazar nahi aati. delhi main jagah jagah Gaai bethi rehati hai. jo khane ke naam per kachra khati hain. Kachra ke Saath saath wo polythene bhi kha jaati hain. log khane ka samaan polythene me daal ker phenkte hain. Gaai poly-bag ke saath hi roti aata jo bhi hota hai kha leti hain or mar jaati hain.
Kitni hi Gaai ke tummy se kitne kilo ke hisaab se polythene nikla. ye Gaai ke rakhwaale in lawaaris Gaai ko animal shelters mein kyon nahi chor ker aate. ye sirf logon ko preshan karne ki baatein hai. jo log sewa bhav rakhte hain wo dhindhora nahi peetaty.meri to sabse yahi binti hai ki khane ki cheez ko polythene mein na daalen. janwaro ko samjh nahi hoti ki wo khol ker khaynge. say no to polythene.

Monday, 9 May 2016

मंदिरों में वयवस्था की कमी

अभी हाल ही मे हम अपने ग्रुप के साथ माउन्ट आबू गए।वहां घूमने के बाद हम लोग अम्बा जी के दर्शन करने के लिए गए।अम्बा जी का मन्दिर बहुत ही भव्य है।सफ़ेद मार्बल से बना हुआ मन्दिर जो आपको
बहुत ही आकर्षित करता है।जैसे ही हम आगे बड़े दो पुलिस वाले जिनमें एक लेडी पुलिस भी थी जो की बहुत ही गंदे तरीक़े से आपका सामान चैक कर
रही थी।वहां से आगे बड़े तो मंदिर में परवेश करने के रास्ते सफ़ेद मार्वल का फर्श था।फर्श इतना गर्म था कि हम लोगों के पैर जल रहे थे।
कंही कंही टाट था लेकिन जगह जगह से इकठ्ठा हो रखा
था।चलो हम और आगे बड़े, कुछ लोगों ने अगर-बत्ती और नारियल हाथ में लिया हुआ था।आगे बड़े तो एक पुलिस वाला बोला कि नारियल यहाँ साइड में एक जगह बनाई हुई थी वहाँ तोड़ कर फिर ले कर जाओ।
यहाँ नारियल तोड़ रहे थे वहाँ नारियल का पानी नाली में बह रहा था और बहुत ही बदबू आ रही थी।सभी जानते हैं कि नारियल पानी कितना उपयोगी होता है।कितना नारियल पानी बरबाद होता है किसी को कोई परवाह नहीं।और आगे गये तो पानी पीने का कूलर लगा हुआ था।कूलर का पानी खारा और गर्म था।कूलर काम नहीं कर रहा था।हमने गर्म और खारा पानी पी कर ही
प्यास बुझा ली।जैसे तैसे धका मुकी करके हमने माँ अम्बे के दर्शन कर लिये।मन्दिर बहुत ही विशाल और भवय था।सोने का वर्क चढ़ा हुआ खूबसूरत मंदिर।चलो माँ के दर्शन हो गए।अब हम लोग बाथरूम जाना चाहते थे।
किसी से पुछा तो उसने रास्ता बता दिया।वहां जा कर जो दृश्य देखा मेरे तो होश उर गए।एक 8/6 फीट की जगह में पुराने जमाने का ओपन बाथरूम था।ना वहां इंडियन टॉयलेट थी ना इंग्लिश।बस सब ऐसे ही एक दूसरे के सामने ही बेठै हुये थे।इतना बड़ा मन्दिर और इतना चढ़ावा चढ़ता है लेकिन भक्तों के लिये जन सुविधाओं की इतनी कमी।इतना पैसा श्रद्धालु चढ़ाते हैं क्या उनके लिये पीने के पानी और शौचालय की कमी क्यों।ये मदिरों की इतनी कमाई का कोई हिसाब नहीं।कम से कम इतना पैसा आता है लंगर का प्रबन्ध हो ठंडे पानी का प्रबन्ध हो ।जनसुविधाओं का प्रबन्ध हो ताकि विदेशी आए तो हमारी व्यवस्था की तारीफ़ करें।वो ये सब देख कर सोचते होँगे कितना गरीब देश है।

Friday, 26 February 2016

Doctor ya Dukandaar

आजकल जरा सी छींक भी आ जाए तो डॉक्टर
इतने सारे टेस्ट लिख देते हैं कि समझ नहीं आता कि इनकी जरूरत है भी या नहीं।हमारे साथ ऐसा बहुत बार होता है ।हम लोग यह सोचते हैं कि डॉक
टर ने कहा है तो करवा लेते हैं।मेरे साथ यह घटना कई बार हो गई तो सोचा इस विषय पर लिखना चाहिए।
आज कल डाक्टर दुकान दारी  करते नजर आते हैं। एक बार मेरे पति को तकलीफ हुई जिसकी वजह से डाक्टर के पास जाना पडा।जैसे ही हम कलिनिक पहँचे डाक्टर ने कहा आप बस दाखिल हो जाओ आप का आपरेशन करना होगा।इतने मे इनहोने अपने आफिस
फोन किया।उनहोने दुसरे  हासपिटल जाने के लिये कहा।हम वहाँ गए तो बिना आपरेशन के ही इनका इलाज हो गया।यह डाक्टर इतना डरा देते है
कि दुसरी राय भी नहीं लेने देते।
एक घटना तो मेरी जिदँगी मे 2014 मे हुई है ।
मैं ने ऐसे ही डाक्टरोँ के चलते अपनी बेटी को सदा के
लिए खो दिया। एक बुखार औऱ उलटी की वजह
से दाखिल करना पडा।
कोई कहे डेग्ँ है कभी कहें टाऩसिल हैँ ।इन सब के चलते उसको फिट पड गया। एक नामी हासपिटल वालों को फिट का कारण समझ नहीं आया।
दो फिट के बाद ही वैनटीलेटर लगा दिया।उसको लगातार नींद के ईनजैकशन देते रहे।उसको
एक बार भी होश मे नहीं आने दिया।उलटा कोमा के ईनजैकशन लगाने शुरू कर दिये।आज कल मैं ने कितने लोगों को देखा है जिनको फिट पडते हैं।मेरी बेटी की तो ऐसी कोई बिमारी नहीं थी कि उसे शुरू से फिट
पडते हों।मेरी बेटी को एक एक लाख के पाचं टीके लगाए जो बाजार मे 15 से20 हजार के बीच मे था
लेकिन फिर भी उसे होश नहीं आया।अब मेरी बेटी जीवन की लडाई लड. रही थी।कुछ भी ठीक नही था।
मेरे दिल मे डर घर करने लग गया था कि कुछ गलत हो रहा है।अब हम अपनी बेटी को वहाँ से ले जाना चाहते थे।दुसरे हासपिटल मे देखना शुरू किया। टाँसफर
वाला केस था।कोई भी लेने के लिए राजी नहीं था।
काफी धक्के खाने के बाद मेरी बेटी को हमने निमहाँस हासपिटल मे शिफ्ट किया।उनहोने जाते ही बता दिया कि  एक ही पृतिशत उम्मीद बाकी है। वैनटीलेटर कि वजह से कोई भी अगँ अपने आप काम नहीं कर रहा था। औऱ निमहास मे दस दिन बाद मेरी बेटी इस दुनिया को अलविदा कह गई।बडे बडे शहरों मे जो डाक्टर बेठै हैं पता नहीं उनके पास डिग्री भी असली है या नहीं।
अभी पिछले हफ्ते मैं अपनी छोटी बेटी को डाक्टर के
पास ले कर गई ।बुखार की वजह  जाते ही डाक्टर ने काफी सारे टैसट लिख दिये।जब रिपोर्ट दिखाई तो बोले कि यह यह परेशानी हो सकती है।  2250 रुपये का एक टीका है आप 10 टीके लगवा लो।वही रिपोर्ट मैं ने सरकारी डिसपैसरी मे दिखाई तो उस डाक्टर ने बताया कि इतने पावर वाले टीकौँ की जरुरत नहीं है।तो इससे जाहिर होता है कि आज कल के डाक्टर दुकान दार बन गए हैं जो महँगी से महँगी दवाई बेचना चाहते हैं भले ही किसी की जान चली जाए ।ये डॉक्टर नहीं जल्लाद हैं।

Saturday, 20 February 2016

हमारे टैक्स का दुरुपयोग

हमारे मेहनत की कमाई का एक हिस्सा जो टैक्स के रूप में हमारी सरकार को जाता है ,उसकी बर्बादी कैसे होती है यह देखने वाली बात है।
आजकल हर चौराहे पर और हर सड़क के किनारे अर्द्ध गोलाकार बना दिये गए हैं ताकि चौरस किनारों से
किसी को नुक्सान ना हो।वैसे तो यह बहुत
अच्छा काम है, लेकिन अगर इस काम को ज़िमेदारी के साथ किया गया होता तो ज्यादा अच्छा होता।ये अर्द्ध गोलाकार कब बने और कब टूट गए पता ही नहीं चला।
सभी चौराहे और सड़कों का यही हाल है।कुछ दिन पहले सब टूटे हुए थे, अब उनको उठा कर वैसे ही प्लास्टर लगा कर जोड़ दिया गया है।मेरा कहना यह है कि जो इंजीनियर इस काम को देखते हैं क्या
उनको पता नहीं कि, रेत और सीमेन्ट का रेशो
क्या होता है जिससे बनाया गया मिक्सचर मज़बूत हो।या फिर इंजीनियर और ठेकेदार की मिलीभगत का
नतीज़ा है ये सड़क के किनारे बने हुये ये अर्द्ध गोलाकार
इतने कमजोर हैं कि एक साइकिल की टक्कर से ही टूट जाएं।क्यों नहीं ऐसे काम करते जो सालों तक चलें।
जितना पैसा का ठेका इनको मिलता है उसका आधा भी लगा दें तो बड़िया काम हो।लेकिन अगर सौ रूपय में से पच्चीस रुपये ही लगाने हैं तो ऐसा ही काम होगा।जरूरत है ऐसे इंजीनियर और ठेकेदारों की नकेल कसने की।लेकिन करेगा कौन? सभी तो मिले हुए होते हैं।चोर चोर मौसेरे भाई।

Thursday, 18 February 2016

एक दिन की सफाई

आजकल शहरों में चलन है सफाई का, और वो भी बहुत जोर शोर से। किसी भी एक नेता को बुला लिया जाता है। इसके लिए पहले से ही प्रचार शुरू हो जाता है। उस क्षेत्र के जाने माने लोग भी आ जाते हैं। नेता जी के साथ मिल कर खूब सफ़ाई होती है और खूब फ़ोटो
निकाले जाते हैं। नेता जी के जाने के बाद सभी चले जाते हैं। उसके बाद सब उस जगह के बारे में भूल जाते हैं। उस जगह पर फिर से गंदगी जमा होने लग जाती है।लोग छोटे छोटे बने हुये शॉपिंग मॉल में आते हैं जो सोसाईटी के पास ही बने होते हैं, ताकि लोग अपनी जरूरत का सामन ख़रीद सकें। इन दुकानों पर हर सामान मिल जाता हैं। साथ में छोटे छोटे दुकान दार
जैसे चाट वाला आइसक्रीम वाले भी बैठ जाते हैं। अब हमारे जैसे ही लोग जो पढ़े लिखे होते हैं
अपने बच्चों को लेकर जाते हैं। वह अपने बच्चों को आइसक्रीम या कुछ और भी लेकर देंगे तो
उस खाने का कवर वंही फैंक देंगे। अब जगह
जगह कुढ़े दान होने के बावज़ूद इधर उधर कुढ़ा
डालेंगे तो गंद तो फैलेगा। अब इसके जिम्मेदार तो हम खुद ही हैं, तो बजाए एक दिन सफ़ाई करने के, अगर हम यह सोच लें की हमको गंद नहीं डालना है तो
हमारा शहर खुद ब खुद ही साफ़ रहेगा। तो हमारा नारा होना चाहिए। गंद नहीं फैलाना है शहर को सुंदर बनाना है।

Monday, 15 February 2016

मेरी मॉं बोली

बच्चे अपनी माँ से जो भाषा सबसे पहले बोलना सीखते हैं, उस भाषा को माँ बोली कहते हैं।लेकिन आज के नए युग मे माँ बोली ईगंलिश हो गई है।कयोकि कोई भी
अपनी मातृ भाषा बोलना ही नही चाहता।सभी को इग्लिश
सिखाने की होड़ लगी हुई है।नई पीढ़ी के लोग यह नही समझ पाते कि दुसरी औऱ तीसरी भाषा तो बच्चे सकूल मे सीख ही लेंगे ।सबसे पहले हमे  को अपनी भाषा सिखानी चाहिए ताकि बच्चे को अपने दादा दादी के साथ बात करने मे कोई परेशानी ना हो।कई बार देखने
मे आया है कि बच्चे जब अपने माँ पापा के साथ
अपने गांव जाते हैं तो वहाँ उनको अपने बड़ों के साथ बात करने मे बहुत परेशानी होती है।अभी भी गांव मे कई लोग बहुत  ज्यादा पढे. लिखे नहीं हैं।
ऐसे मे ना तो बच्चे उनकी बात ठीक से समझ पाते हैं
ना अपनी बात समझा पाते हैं।ऐसे संसकारों का कया फायदा जो भाषा के आभाव मे अपनो को अपने से दूर कर दे।यह माता पिता का फर्ज़ है कि वह अपने बच्चे  को अपनी भाषा की इज़त करनी सिखाएँ ।कोई भी भाषा किसी से कम नही होती।

Saturday, 13 February 2016

जिब्रा क्रॉसिंग की कहानी

हम चौराहे पर रुक जाते हैं जब लाल बत्ती होती है।चौराहे के चारों और की सड़क पर सफेद रंग की बड़ी बड़ी लाइन होती हैं।इन लाइन को जिब्रा  क्रोसिंग कहते हैं।जिसका मतलब यह होता है कि हमको इस लाइन के पीछे अपनी गाड़ी को खड़ा करना है,ताकि पैदल चलने वाले आराम से सड़क पार कर सकें।लेकिन हमारे यहाँ इतने पढ़े लिखे लोग हैं जो शायद जिब्रा क्रोसिंग का मतलब यही समझते हैं कि गाड़ी या तो उसके ऊपर खड़ी करो या उससे आगे।लोग सड़क पर चलने वालों को गालियां देते हैं कि उनको चलना नहीं आता, कोई उनसे पूछे कि आप तो पढ़े लिखे हैं तो आपको पता होना चाहिये कि गाड़ी को कंहा खड़ा करना है।जिब्रा क्रोसिंग लोगो के सड़क पार करने के लिये होता है। जिसके पास जितनी बड़ी गाड़ी होती है वो सड़क पर उतना ही कानून का उलंघन करता है।अगर उनसे कुछ कहो तो वह आपसे लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।उनको यह ज्ञात नहीं कि उनकी यह लापरवाही किसी क़ी जान ले सकती है।आप सड़क पर जरूर गाड़ी चलाएँ लेकिन कुछ नियम हैं जिनका पालन करना बहुत जरूरी है।हमको कानून का आदर करना चाहिए।

पार्कों की बढ़ती महत्ता


जो पार्क हमेशा खाली रहते थे आजकल उनमे सुबह शाम को काफी भीड़ रहती है।लोगों को पार्क का महत्व समझ आने लगा है।आज से ग्यारह साल पहले जो पार्क ख़ाली रहते थे आज उनमे सुबह शाम रौनक रहती है।जिस पार्क में पहले भैंस और गाय जैसे जानवर घास खाते नज़र आते थे, आज वहाँ छोटे बच्चे खेलते नज़र आते हैं।पार्क में सुबह सुबह लोग भागते और योग करते नज़र आते हैं।जहाँ बुजुर्ग लोग धीरे धीरे योग करते नज़र आते हैं, वहीं नोजवान लोग भागते हुए जॉगिंग करते हुए दिख जाते हैं।शाम को बुज़ुर्ग औरतें भजन गाती हैं।यह उनका मनपसंद काम है।गाँव की औरतों को देखना बहुत अच्छा लगता है।वो सिर को ढक कर आती हैं और बहुत ही जोश मे सैर करती हैं।अगर उनका कोई बुजुर्ग मिल जाए तो वो मुंह ढक लेती हैँ।तो मेरा मानना है कि अब लोग अपनी सेहत को लेकर बहुत जागरूक हैं।

Wednesday, 10 February 2016

पॉलीथिन का पॉल्युशन

 
हम सभी जानते हैं कि पॉलीथिन से कितना पर्दूषण फैलता है।फिर भी हम कुछ नहीं करते, क्योंकि हम कुछ करना ही नहीं चाहते।सिर्फ बातें ही करते हैं कि कितना गंद फैलता है।
हमको चाहिए कि, हम घर से थैला ले कर जाएं।कुछ लोग लेकर जाते है, लेकिन कुछ लोगों से कुछ नहीं होग़ा। ये हम सबकी ज़िमेदारी है मुझको याद है जब मैं छोटी थी मेरी माँ बाज़ार थैला लेकर या कैन की टोकरी लेकर जाती थी।ये कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं ,सत्तर के दशक की बात है।उस समय इतना पर्दूषण नहीं था।आज हम टेक्नोलॉजी में चाहे कितना भी आगे बढ़ गए हैं लेकिन उतना ही हम अपने वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। लोग जानवरों के लिये खाना भी पॉलीथिन में बाँध कर फैंक देते हैं
।खाना खाने के लालच मे गाय और अन्य जानवर पॉलीथिन भी खा जाते हैं।
जिसके कारण जानवर की मृत्यु हो जाती है।पॉलीथिन को गलने  मे सालों साल लग जाते हैं।
हमारे देश मे कानून तो बनते है, लागू भी होते हैं लेकिन कोई मानता नहीं।
कानून सख्त ना होने की वजह से किसी को डर  नहीं।दिल्ली में हर और पॉलीथिन नज़र आते हैं।
बरसातों में सारे  गटर  ओवर फलो हो जाते हैं। मेरी सभी से यही बिनती है कि घर से बैग लेकर जाओ।जिससे कम कचरा फैलेगा।अपने शहर को खूबसूरत बनाना सरकार का ही  नहीं
हमारा भी काम है।आओ अपने देश और शहर को सुन्दर बनाने का प्रण लें।पॉलीथिन को हाथ ना
लगाएँगे थैला हम अपनायेंगे।

Monday, 8 February 2016

दिवाली के बाद भगवान की हालत

दीवाली के आते ही हर कोई बहुत खुश होता है।घरों की सफाई शुरू हो जाती है।
नई नई चीज़ें घर आती हैं।सबसे ख़ुशी की बात तो ये होती है की बच्चों के लिये नये कपड़े लिये जाते हैं।और तो और भगवान भी नए लाय जाते हैं । उनको बहुत ही प्यार से घरों में सजाया जाता है।
दिवाली वाले दिन बहुत ही श्रद्धा से पूरा परिवार बैठ कर लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा करता है।
माँ भी कहती है बेटा भगवान जी को गंदे हाथ नहीं लगाना।
दिवाली बीत जाने के बाद बेचारे भगवान् को भी लोग उनकी जगह दिखा देते हैं।
भगवान जी को उठा कर किसी भी पेड़ के नीचे रख दिया जाता है।
सारे फूल और सामान के साथ।अब पेड़ के नीचे बेठे
भगवान सोचने पर मजबूर हो जाता है कि, क्या यही भक्ति है?जो परिवार मुझको इतनी श्रद्धा से घर लाया था, अब मुझको पेड़ के नीचे किसी रख कर चला गया है।
और पेड़ के नीचे रखे उस सामान पर जानवर गन्दा करते हैं।
क्या पढ़े लिखे लोग इतना नहीं जानते कि इस तरह वो भगवान्
का कितना अपमान करते हैं।मेरा इतना कहना है कि अगर सारा सामान फैकना ही है तो चांदी के लक्ष्मी गणेश लो और उसे हर दिवाली पर पूजा में रखो।इससे ना हमें हर साल भगवान खरिदने पढ़ेंगे ना
ही पेड़ के नीचे बैठाने पढ़ेंगे।

Sunday, 7 February 2016

सरकारी स्कूलों में गिरता शिक्षा का स्तर

मै पिछले ढाई साल से एक ngo के साथ जुड़ी हुई हूँ।वहाँ मै छोटे अनाथ बचों को पढ़ाती हूँ।वहाँ जाकर जो मैंने शिक्षा का हाल देखा मुझे बहुत दुःख हुआ।सभी बच्चे स्कूल तो जाते हैं, लेकिन वहाँ वे क्या पढ़ते हैं ये मुझको नहीं पता।चौथी क्लास के बच्चे को क ख़ ग  भी नहीं आता था। पूछने पर पता चला की अध्यापिका कक्षा में आती हैं, ऒर ब्लैक बोर्ड पर लिख देती हैं और बच्चे उसको अपनी कॉपी में लिख लेते हैं।जो बच्चे अनाथ हैं उनकी और थोड़ा ज्यादा तवज्जो देना चाहिये ताकि वो जिंदगी मे कुछ कर सके।अग़र एक सभ्य समाज बनाना है तो मुझे लगता है कि सबको इस और ध्यान देना चाहिये।टीचर बेफिक्र हैं क्योंकि बच्चों को कक्षा आठ तक फेल नहीं कर सकते।बच्चे भी पढ़ाई को लेकर बेफिकर हैं की हम फेल नहीं हो सकते।ये हमारे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाढ हो रहा है जिसकी ओर सरकार को ध्यान देना चाहिये।शिक्षा के स्तर को अच्छा बनाने के लिये जरूरी है इस क्षेत्र में कढ़े कदम उठाना।गरीब बच्चों के माँ बाप उनको पैसे के लालच में भेज देते हैं स्कूल, अब बच्चा क्या पढ़ रहा है इस पर वह भी ध्यान नहीं देते।वो इतने गरीब हैं की बस पैसा मिल रहा है इसी से वे खुश हो जाते हैं।
आखिर इन बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी किस पर है माँ बाप पर अध्यापिकों पर या समाज पर।सोचिए?

Saturday, 6 February 2016

हिजड़ा

क्या याद है तुमको मेरी माँ, या तुम मुझको भुल गयी।।                                                                        
जन्म दिया था जिसको तुमने, उससे ही तुमदूर हुई।
खड़ी हुई चोराहे पर में ये सोचा करती हूँ,
छूट गया माँ आंगन तेरा जहाँ मै खेला करती थी।
छूट गए सबसंगी साथी, टूट गए सपने सारे।
ना गलती थी मेरी कोई ना ग़लती थी तेरी।
ऊपर वाले की गलती ने दुनिया बदली मेरी।
बीच खड़ी चौराहे पे मैं मांगू सबसे भीख।
कोई देता मुझे गालियां कोई देता सीख।
गला दबा देती माँ मेरा,
मै ना करती शिकवा।ना दुनिया में मेरा कोई ना मेरा कोई रिश्ता।
जाऊँगी जब मै दुनिया से क्या कोई रोयेगा।
एहसास मेरे जाने का माँ क्या तुम कर पाओगी,
चली गई है बेटी मेरी क्या ये कह पाओगी